सुप्रीम कोर्ट का फैसला : 25-30 साल पढ़ाने वाले शिक्षक अब खुद देंगे परीक्षा : टीईटी की अनिवार्यता से शिक्षक परेशान : नौकरी पर संकट की चिंता : केंद्र से राहत की मांग
मध्यप्रदेश शिक्षक महासंघ के जिला अध्यक्ष एवं प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के जिला सचिव चरणसिंह चौधरी ने कहा कि यह लाखों शिक्षकों की रोजी-रोटी का सवाल है। उन्होंने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप कर सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलाने की मांग की।
सैलाना (प्रकाशभारत न्यूज़) प्रदेश में टीईटी परीक्षा की अनिवार्यता को लेकर शिक्षक समुदाय में भारी चिंता और असमंजस का माहौल है। दो से ढाई दशक से बच्चों को पढ़ा रहे शिक्षक अब खुद को योग्य साबित करने के लिए दोबारा परीक्षा देने को मजबूर हैं। गर्मी की छुट्टियां, जिनका इंतजार शिक्षक परिवार और घूमने-फिरने के लिए करते थे, इस बार टीईटी की तैयारी में गुजर रही हैं। कई शिक्षक वर्षों बाद फिर से किताबें उठाने को मजबूर हैं और नौकरी पर मंडरा रहे खतरे से मानसिक तनाव भी झेल रहे हैं।
दरअसल, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और शिक्षा के अधिकार कानून के पालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 1998 से 2005 के बीच भर्ती हुए शिक्षकों के लिए भी टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया है। वर्ष 2005 के बाद भर्ती शिक्षक पहले से ही टीईटी उत्तीर्ण हैं। इस फैसले के बाद प्रदेशभर में शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किए और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दायर की, लेकिन कोर्ट ने परीक्षा में छूट देने से साफ इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल उन शिक्षकों को राहत दी है जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच साल या उससे कम समय बचा है। यानी 57 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले शिक्षकों को ही छूट मिलेगी, जबकि बाकी सभी शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी।
शिक्षक समुदाय का कहना है कि जिस समय वे भर्ती हुए थे, उस समय लागू नियमों के अनुसार ही उनकी नियुक्ति हुई थी। अब 25-30 साल बाद दोबारा परीक्षा देना बेहद कठिन है। उनका तर्क है कि यदि कोई अनुभवी शिक्षक एक-दो अंक से परीक्षा में असफल हो जाए तो उसकी नौकरी पर संकट खड़ा हो जाएगा। कई शिक्षकों ने अपने बड़े बच्चों के सामने संकोच के साथ फिर से पढ़ाई शुरू कर दी है।
जानकारी के अनुसार प्रदेश में करीब एक से डेढ़ लाख शिक्षक ऐसे हो सकते हैं जिन्हें टीईटी परीक्षा देनी होगी। रतलाम जिले में यह संख्या 3 से 4 हजार और सैलाना-बाजना क्षेत्र में करीब 1 से डेढ़ हजार बताई जा रही है।
मध्यप्रदेश शिक्षक महासंघ के जिला अध्यक्ष एवं प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के जिला सचिव चरणसिंह चौधरी ने कहा कि यह लाखों शिक्षकों की रोजी-रोटी का सवाल है। उन्होंने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप कर सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलाने की मांग की। उनका कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले भर्ती शिक्षकों को इस परीक्षा से मुक्त किया जाना चाहिए।
वहीं राज्य कर्मचारी संघ तहसील अध्यक्ष जगदीश परिहार ने इसे शिक्षकों का अपमान बताते हुए कहा कि वर्षों के अध्यापन अनुभव को ही शिक्षक की योग्यता माना जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि शिक्षक अयोग्य थे तो उनसे पढ़कर उच्च पदों तक पहुंचे विद्यार्थियों की उपलब्धियों का क्या अर्थ रह जाता है।
जिला शिक्षा अधिकारी अशोक लोढ़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार वरिष्ठ कार्यालय से जो निर्देश प्राप्त होंगे, उनका पालन किया जाएगा।
संभावना जताई जा रही है कि प्रदेश में टीईटी परीक्षा का आयोजन जुलाई या अगस्त माह में किया जा सकता है।
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